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Independence Day Speech in Hindi – स्वतंत्रता दिवस समारोह भाषण हिंदी में

इस पृष्ठ पर हम स्वतंत्रता दिवस समारोह भाषण (Independence Day Speech in Hindi) के बारे में चर्चा करेंगे जो आप स्वतंत्रा दिवश दिवस पर प्रस्तुत कर सकते हैं ओर लोगों के प्रति अपना आभार प्रकट कर सकते हैं।

Independence Day Speech in Hindi

“पराधीन सपनेहु सुखनाहीं”

पिछले वर्षों की भांति इस वर्ष भी हम लोग स्वतंत्रता दिवस मानाने के लिए एकत्रित हुए हैं। सर्व प्रथम में इस अवसर पर आपको हृदय से शुभ कामनाएं प्रेसित करता हूँ। एक बड़े संघर्ष के बाद हमें ये सुबह दिन मानाने का अवसर प्राप्त हुआ है। 1857 के सैनिक विद्रोह जिसे अंग्रेजी सत्ता ने कुचल दिया था, उन्हें धीरे धीरे 1947 में पूर्ण स्वराज के रूप में परणित हुआ।

कितने ही आजादी के दीवानों ने अपना सर्वश्व इसके लिए न्योछावर कर दिया। सरदार भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर, जैसे अनेकों क्रांतिकारियों के बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। संसद में भगत सिंह के बम काण्ड ने देश की के आजादी के लिए जवानों की कटबधिता का प्रदर्शन फांसी पर हस्ते-हस्ते जीवन न्योछावर करके किया, जिसमें उनका साथ सुखदेव और राजगुरु ने दिया और वो भी 23 मार्च 1931 को सूली पर झूल गए। आज भी उनके आजादी के तरानों की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।

दूसरी ओर महात्मा गाँधी के नेतृत्व में सत्य ओर अहिंसा के बल पर अंग्रेजी शासन के विरोध में अंग्रेजों भारत छोड़ो तथा अनेक असहयोग आन्दोलोनो को देश व्यापी आंदोलन बनाया गया। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आन्दोलोनो को दबाने के लिए शासन द्वारा अपनायी जा रहीं दमनकारी नीतियों ओर निरसंश अत्याचारों के द्वारा दबाया नहीं जा सका। जलियांवाला बाघ, दण्डी मार्च अंग्रेजों भारत छोड़ो साइमन कमीशन वापस जाओ, देश की जनता द्वारा किये गए कितने ही आंदोलन उनके बेमिसाल उधारण हैं जिन्हें गाँधीजी ने नेत्तृत्व प्रदान किया।

आध्यातित्मिक मूल्यों को जीवन के धरातल पर जिस प्रकार सफलता पूर्वक हतियार बनाये ओर उन्हें अपना कर एक उधारण प्रस्तुत किया जो दुनिया को एक अद्वती ओर कभी ना बुलाया जाने वाला रास्ता दिखाया। इसलिए महात्मा गाँधी, राष्ट्र पिता ओर बापू कहलाये।

आज के दिन सारे देश में 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस एक राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मनाया जाता है हर स्कूल, गांव, शहर तथा छोटी छोड़ी आबादी में झंडा रोहन, राष्ट्रगान तथा आजादी से परिपूर्ण गायन से वातावरण गुंजायमान हो उठता है। बच्चों के खेल तथा विभिन प्रकार की प्रतियोग्ताएं कराई जाती हैं। मिस्ठानओर फल इत्यादि वितरित किये जाते हैं। आयोजनों में वक्ता अपने भाषणों में स्वतंत्रा सैनानियों को नमन कर उनका आभार व्यक्त करते हैं।

आजादी प्राप्त करने में जिन लोगों ने बलिदान दिए उन्हें श्रद्धांजिली देते हैं ओर उनकी प्रतिमाओं पर पुष्प मालाएं अर्पित कर उनके अमरत्त्व की कामनाएं करते हैं। विभिन वक्ता अपनी अपनी तरह तथा आजाद भारत के विभिन छेत्रों में हुई प्रगति ओर उसके गुण दोषों पर विचार करते हैं। यद्द्पि नियत आचरणों ओर कर्तव्यों से प्रतबंदित ओर अनुशासित स्वम का शासन किसी भी प्रकार दूसरों के शासन से सदैव श्रेष्ठ होता है फिर भी आज उसकी समीक्षा की आवश्यकता है।

हमें हर उत्सव सिर्फ एक परंपरागत तरीके से ही नहीं मानना चाहिए बल्कि आवश्यकता है की हम मनाने की प्रस्तभूमि में क्या निहित है उस पर भी गम्भीरता से उस उत्सव पर विचार करना चाहिए। आज इस अवसर पर स्वतंत्रा क्या है, जिसे प्राप्त करने के लिए सैकड़ों वर्षों तक संघर्ष रत लोगों ने कितनी यातनाएं सही अपना सर्वश गवांया।

स्वतंत्रा की हर वर्षगाँठ पर हमें विचार करना चाहिए की इतने समय से हमारी आज क्या स्थिति है। इस लंम्बे समय में हमने क्या पाया और क्या खोया, क्या हमारी दिशा और दशा ठीक है। एक-एक विषय पर गम्भीरता और ईमानदारी से विचार करना चाहिए। बिना विषयों की समीक्छा के उनका सही ज्ञान व निर्णय संभव नहीं है। विकास के लिए अनंत अवकाश है, निर्भर करता है आपकी समझ और सूझ भूझ के कायन्वण पर। कुछ निम्नांकित बिंदु हैं जिन पर हम विचार करेंगे।

कितने समय तक प्राण-पण से चलाये गए आन्दोलनों का नारा था – मांग थी पूर्ण स्वराज्य। गांधीजी ने इसके लिए सत्य और अहिंसा का रास्ता अपनाया अर्थात सत्य, अहिंसा पर मन वचन और कर्म से आचरण। सत्य ही ईस्वर है। आत्मा ईस्वर का अंश है जो मनुष्य का वास्तविक स्वरुप है। पंचभूतों, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बने हुए शरीर को ही हम अपना मानकर उसके सुख के लिए सारे जीवन अच्छे बुरे कार्य करते रहते हैं परन्तु वास्तव में ईस्वर के दर्शन, आत्मा की शरीर के बंधन से मुक्ति अथवा आजादी, सत्य और अहिंसा को जीवन में अपनाकर ही प्राप्त की जा सकती है जो की मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य है। इसलिए महात्मा गाँधी को महान और महात्मा कहा जाता है। उन्होंने,

दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल,
साबर मति के संत तूने कर दिया कमाल।

गांधीजी का कहना था की किसी अच्छे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अच्छे साधन ही अपनाये जाने चाहिए। खून से दागी आजादी, आजादी के मुहं पर बदनुमा धब्बा होगा। गांधीजी इसी के लिए जिए और इसी के लिए मरे, मरते समय तक उनका संघर्ष पूर्ण स्वराज्य, धर्म निरपेक्षता, हिन्दू-मुस्लिम, सिख-ईसाई एकता, अस्पर्शता तथा ऊंच नीच के भेद के उत्पीड़न के विरुद्ध जारी रहा। इस आंदोलन में उनके साथ जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, बाल गंगाधर तिलक, डॉक्टर राजेंदर प्रसाद, मौलाना अबुल कलम आजाद और अन्य कितने ही अहिंसावादियों ने कंधे से कन्धा मिलकर गाँधीजी का साथ दिया। स्वतंत्रा दिवस के इस सुबह अवसर पर आईये हम जो राह उन्होंने दिखाई उसी पर चलने का संकल्प लें।

सृस्टि में आसुरी और दैविक प्रकार की प्रकति के प्राणी होते हैं। देश की आजादी के लिए उस समय सभी देश वाशियों ने चाहे वो हिन्दू अथवा मुलसलमान या किसी अन्य जाती धरम का, सभी ने अंग्रेजी शासन को जड़ से उखाड़ फेंकने की भावना से कार्य किया, फिर भी कुछ स्वार्थी तत्व अपने निहिरज स्वार्थ के लिए अंग्रेजों की हाथ की कठपुतली बने हुए थे। अंग्रेज भी फुट डालो शासन करो की निति पर कार्य कर रहे थे, इसी कारण देश को आजाद होने में बहुत समय लगा, अंत में भी अंग्रेजों ने बहुत प्रयाश किया और कुछ हद तक अपनी योजना में पाकिस्तान को अलग देश बनवाने में कामयाब हुए। कश्मीर आज भी उसी समय का नासूर है। कुछ रियासतों को अपने साथ जोड़ने में हमारे नेताओं ने भी दूर दृस्टि और निर्भीकता का परिचय दिया। अन्तोगत्वाः 15 अगस्त 1947 को लाल किले के प्राचीर से तिरंगा फैराकर देश की आजादी की घोसणा देश के प्रथम प्रधानमंत्री श्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने स्वतंत्रता दिवस समारोह भाषण (Independence Day Speech in Hindi) देकर की।

देश की आजादी की घोस्णा के बाद सबसे प्रमुख और आवयश्यक काम था देश की शासन व्यवस्था को चलाने के लिए एक सविंधान का प्रारूप तैयार करना जो एक अतयंत जटिल काम था। महात्मा गाँधी की 30 January 1948 को हत्या के कारण एक उपयुक्त और निर्णायक व्यक्ति की कमी अवश्य खल रही थी। सविंधान पीठ और उसके संचालक मंडल का गठन किया गया। डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की अध्यक्षता में देश के श्रेष्ठ व्यक्तियों ने सविंधान बना कर तैयार किया। 26 जनवरी 1950 को भारत को गंडराज्य घोषित किया गया। देश की शासन व्यवस्था प्रजांतरिक शासन व्यवस्था निश्चित की गयी जो प्रमुख रूप से तीन निकायों द्वारा संचालित होती है। सभी के संचालन के लिए सविंधान में व्यवस्था हैं जिन्हें संसद और विधानसभाहों में जनता के चुने हुए प्रतिनिधि द्वारा संसोधित अथ्वा नयी व्यवस्थाएं, आव्यकस्था के अनुरूप बनाई जाती हैं, उन्हें संसद और विधानसभा में पारित कराने के बाद प्रजा पर लागू किया जाता है।

प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जो जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा बनाई जाती है उन्हीं के द्वारा नियुक्त प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा प्रजा पर सही प्रशासन बनाये रखने के लिए लागू किया जाता है। वास्तव में जनतांत्रिक प्रणाली, शासन चलाने के लिए एक उत्तम प्रणाली है परन्तु इसकी सफलता शिक्षा और मानव चरित्र पर निर्भर करती है। मानव चरित्र का दिन प्रतिदिन र्हास हो रहा है इसलिए सभी व्यवस्थाओं की स्तिथि भी उसी के अनुरूप है। न्यायक और कार्यकारी दोनों निकायों में विधायिकी का हस्तक्षेप भड़ता जा रहा है, उस पर गम्भीरता से विचार करें और उसके सुधार के लिए शिक्षा चरित्र निर्माण आवश्यक है अन्यथा प्रजातंत्र पुनः खतरे में आ जाएगा, आज इसके लिए हम संकल्प लें।

प्रजातंत्र में मतदाता के मत में सबसे अधिक शक्ति निहित है उसका प्रयोग प्रतिनिधियों को सही चयन करना, उसी के अनुरूप सरकार और व्यवस्थाएं बनाना है। परन्तु आज जनता के मत को सत्ता में आने और बने रहने के लिए किस प्रकार प्रभावित किया जा रहा है उसे पता भी नहीं चलता। प्रजातंत्र में प्रतिनिधियों के चुनाव में जो तत्व प्रभावित करते हैं उन्हें समझने की महती आव्यश्यक्ता है।

1) सबसे प्रथम मतदाता में राजनैतिक जागरूकता अत्यंत आवश्यक है जो सही और चरित्रवान शिक्षा के बिना संभव नहीं है।

2) धर्म और राजनीती अलग हैं इसलिए धर्म, जाती और पंत को चुनाव में राजनीती से अलग रखना चाहिए। यदपि यथार्थ ज्ञान प्रत्येक धर्म में ईश्वर ही है। अतः राजनीती धर्म निरपेक्ष नहीं परन्तु यथार्थ में धर्म शापेक्ष होनी चाहिए और यही भाव शाषक और जनता में लाने का प्रयाश होना चाहिए।

3) चुनाव में धन बल और भाहूबल बहुत प्रभावित करते हैं, उसे रोका जाना चाहिए।

4) राजनीती में प्रचार का बहुत बड़ा प्रभाव है। मतदाता के विचारों को बदल दिया जाता है, सही ज्ञान के अभाव में उसे पता भी नहीं चलता की इलेक्ट्रिक मीडिया, प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया मतदाता के विचारों को किस प्रकार प्रभावित कर रहा है। जिसका मीडिया पर नियंत्रण है वही सही समाचारों को जनता को अवगत कराने के बजाय अपने पक्ष में प्रस्तुत करता है। प्रजातंत्र में मीडिया निष्पक्ष और स्वतन्त्र होना अति आवश्यक है।

5) हर व्यवस्था और दाल के संचालन में धन का महत्वपूर्ण योगदान है। जब तक इकाई से लेकर निकाय तक आर्थिक रूप से हम स्वतन्त्र नहीं हैं प्रजातंत्र और व्यवस्थाओं की सफलता संगन्ध बानी रहेगी। कहीं पर भी मत का प्रयोग संभव नहीं है।

6) हर देशवासी की न्यूनतम आवश्यकता है रोटी, कपडा और मकान, जो समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है, परन्तु देश में अमीर और गरीब की खाई भड़ती जा रही है। हर हाथ को काम शिक्षा और स्वस्था देने में सरकारें सफल नहीं हुयी हैं। निजीकरण, वैश्वीकरण, उदारीकरण और मशीनीकरण बहुत बड़ा है। हर देश आज हथियारों की होड़ में बारूद के ढेर पर खड़ा है।

आज देश के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उपरोक्त विषयों का मैंने उल्लेख किया है और भी कितने विषय हैं जिन पर विचार करने की आवश्यकता है। बिना विचार किये विषयों का सही ज्ञान संभव नहीं है।

मुस्लिम और अंग्रेजी शासन की गुलामी से स्वादिन भारत के लिए एक लम्बे समय तक संघर्ष चला जिसे 1947 में प्राप्त किया गया परन्तु ऐसा प्रतीत होता है की उसके बाद शासक बदलते रहे परन्तु व्यवस्थाओं में आमूल चूल परिवर्तन नहीं हुआ जिसकी नितांत आवश्यकता थी। भारत देश गाँव में बस्ता है उसके विकास के बिना देश की आजादी अधूरी है, महात्मा गाँधी ने पंचायती राज का सपना संयोया था परन्तु हर पंच वर्षीय योजना में इसके नाम के अतरिक्त विशेष और सही कार्य नहीं हुआ, आज भी हम बहुत कुछ दूसरों पर निर्भर करते हैं।

देश में विकास भी हुआ है इससे इंकार नहीं किया जा सकता परन्तु अभी हम इतने समय के बाद भी विकास शील देशों में आते हैं परन्तु पूर्ण विकसित नहीं हुए हैं, हमारे साथ स्वतंत हुए देश हमसे अधिक विकसित हो गए हैं।

स्वतंत्रता दिवस के इस सुबह अवसर पर हम सब मिल जल कर एकता के साथ देश की समृद्धि और खुशहाली के लिए तन, मन और धन से कार्य करने की शपथ लें “देश से बढ़कर कुछ नहीं है“।